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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

सोमवार, 20 जनवरी 2014

काव्य क्या है.... डा श्याम गुप्त

                                       ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                             काव्य क्या है.... 

                   सभी के अनुभव विचार लगभग समान ही होते है | ज्ञान भी समान हो सकता है परन्तु विचारों की गंभीरता, सूक्ष्मता, निरीक्षण की गहनता, चिंतन, अभिव्यंजना सभी की पृथक पृथक होती है | इसीलिये मानव समूह में साहित्यकार, विद्वान्, विचारक, चिन्तक, ज्ञानी, सामान्य आदि वर्ग होते हैं| यथा ...
सर्व ज्ञान संपन्न विविधि नर,
सभी एक से कब होते हैं  |
अनुभव श्रृद्धा तप भावना,
होते सबके भिन्न  भिन्न हैं |
भरे जलाशय ऊपर समतल,
होते ऊंचे -नीचे तल में ||    ---शूर्पणखा काव्य-उपन्यास से
      जब कोई घटना , तथ्य या कथ्य, स्थिति, विषय-वस्तु अथवा भाव ..मन को गहराई तक स्पर्श करते हैं एवं अंतर्मन को मंथित करते हैं तो भावुक मन उसे अपने काम से काम  के भाव में यूंही छोड़कर आगे नहीं बढ़ जाता |  वह प्रतिक्रया स्वरुप उसके समाधान या समाधान पाने के प्रयत्न में अन्य हृदयों से, जन सामान्य से समन्वय या समर्थन की इच्छा में अपने विचार प्रस्तुत करना चाहता है | साहित्य लेखन, काव्य, गायन, वादन , चित्रकला इसी इच्छा के फल हैं|  भावुक मन में जब भाव ..आत्म-तत्व को मंथित करते हैं तो कोमल भावनाएं गेय रूप में निसृत होती हैं और कविता बन जाती हैं|
         सामान्य व्यक्ति की भाषा विवरणात्मक होती है तो कवि की भाषा में विशिष्टता भावों शब्दों की संश्लिष्टता होती है सामान्य भाषा में जो तथ्य मान्य नहीं हो सकते वे काव्य की भाषा में भावालंकार रूप में सौन्दर्ययुक्त मान्य माने जाते हैं | कविवर रविंद्रनाथ टेगोर का कथन है कि...
        हृदयवेग में जिसकी सीमा नहीं मिलती उसको व्यक्त करने के लिए सीमाबद् भाषा का घेरा तोड देना पडता है, यह घेरा तोड देना ही कवित्व है।
                  सामान्य भाषा में एक ही निश्चित अर्थात्मक तथ्य होते हैं, यथा.... मनुष्य चलता है, पेड़ों की डालियाँ हवा में हिलती हैं, चिडिया उड़ती है, घोड़ा दौडता है आदि.....वहीं कविता में पेड.. डालियाँ रूपी गर्दन हिलाते हैं, घोड़ा हवा से बातें करता है अर्थात काव्य में जड़ तत्वों की भाव ग्राहयता के साथ सौन्दर्य भी है।  सामान्य  भाषा को विशिष्ट भाव-शब्द देने के कारण उत्पन्न होने वाली सौन्दर्यमय, भाव-सम्प्रेषणात्मकता युक्त, सर्जनात्मक भाषा... कविता साहित्य की भाषा है। कविता में भाषा की सर्जनात्मकता, भाषा कथ्य के निश्चित अर्थ के विपरीत शब्द-भावों का लाक्षणिक प्रयोग करके भिन्न सौन्दर्यमय अर्थवत्तात्मकता उत्पन्न की जाती है। यही काव्य है।

मानव, कविता गीत एवं  सामाजिक सरोकार ----सृष्टि की सबसे सुन्दर है कृति है मानव, और मानव की कृतियों में सबसे सुन्दर है- कविता:,.... गीत-- काव्य की सुन्दरतम प्रस्तुति है गीत होते ही हैं मानव मन के सुख-दुख अन्तर्द्वन्द्वों के अनुबन्धों की गाथा जहां भावुक  मन गीत सृष्टा हो तो वे मानव ह्रदय, जीवन, जगत, की सुखानुभूति, वेदना, संवेदना के द्वन्द्वों अन्तर्संबंधों की संगीतमय यात्रा हो जाते हैं ये गीत वस्तुतः मानव ह्रदय की पूंजी होते है--स्वान्त सुखायः......यदि गीतों में जीवन के राग-विराग, कर्तव्य बन्धनों की अनिवार्यता की स्वीकृति के साथ-साथ मुक्त-गगन में उडान की छटपटाहट की व्यष्टि चेतना के साथ जीवन -जगत की समष्टिगतता भी निहित है और निहित है समाज विश्वकल्याण की भावना तो वे निश्चय ही समाधान युक्त होकर कालजयी हो जाते हैं|  सामाजिक सरोकार के बिना कोई भी कविता साहित्य अधूरा ही है।

           शब्द की शक्ति अनंत व रहस्यात्मक भी है। चाहे गद्य हो या पद्य -किसी भी शब्द के विभिन्न रूप व पर्यायवाची शब्दों के कभी समान अर्थ नहीं होते। (जैसा सामान्यतः समझा जाता है। ) यथा--
"
प्रभु ने ये संसार कैसा सजाया."---एक कविता की पंक्ति है । --यहाँ सजाया =रचाया =बनाया कुछ भी लिखा जा सकता है । मात्रा, तुक व लय एवं सामान्य अर्थ मैं कोई अन्तर नहीं, कवितांश के पाठ मैं भी कोई अन्तर नहीं पढता । परन्तु काव्य व कथन की गूढता तथा अर्थवत्तात्मक दृष्टि से, भाव संप्रेषण दृष्टि से देखें तो --
1
.--- बनाया = भौतिक बस्तु के कृतित्व का बोध देता है, स्वयं अपने ही हाथों से कृतित्व का बोध .. कठोर वर्ण है।
२.-- रचाया = समस्त सृजन का बोध देता है, विचार से लेकर कृतित्व तक,  आवश्यक नहीं कि कृतिकार ने स्वयं ही बनाया हो। किसी अन्य को बोध देकर भी बनवाया हो सकता है।
३.-- सजाया = भौतिक संरचना की बजाय भाव-सरंचना का भी बोध देता है। बनाने (या स्वयं न बनाने -रचाने ) की बजाय या साथ-साथ, आगे नीति, नियम, व्यवहार, आचरण, साज-सज्जा आदि के साथ बनाने,  रचाने, सजाने की कृति व शब्दों की सम्पूर्णता-विशिष्टता का बोध देता है।
         प्रभु के लिए यद्यपि तीनों का प्रयोग उचित है । परन्तु ब्रह्मा, देवताओं, मानव के संसार के सन्दर्भ मैं बनाया अधिक उचित होगा। सिर्फ़ ब्रह्मा के लिए रचाया भी। अन्य संसारी कृतियों के लिए विशिष्ट सन्दर्भ मैं तीनों शब्द यथा स्थान प्रयोग होने चाहिए । उदाहरित कविता मैं --सजाया-- शब्द उचित प्रतीत होता है।
           एक अन्य शब्द को लें --क्षण एवं पल --दौनों समानार्थी हैं । परन्तु -- क्षण = बस्तु परक, भौतिक, वास्तविक समय प्रदर्शक तथा कठोर वर्ण है और .. पल = भावपरक, स्वप्निल व सौम्य-कोमल वर्ण है । इसीलिये प्रायः पल-छिन शब्द प्रयोग किया जाता है, सुंदर, भावुक स्वप्निल समय काल-खंड के लिए।

काव्य के उद्देश्य
      साहित्य = सा + हिताय + = अर्थात जो समाज, संस्कृति व मानव  के व्यापक हित में हो वह ही साहित्य है।   अतः साहित्य के मूल भाव-उद्देश्य  होने चाहिये ---
        (1) सम्पूर्ण ज्ञान का अनुशासन (ज्ञान का  कोष ज्ञान की प्रतिष्ठापना ),शास्त्रीय पद्धति से जीवन -जगत का बोध .....
       () जन रंजन के साथ स्वान्त सुखाय ....व्यक्तित्व समष्टि निर्माण की प्रेरणा से सुखानंद, काव्यानंद द्वारा ब्रह्मानंद सुख
       () काव्य सुरसिकता द्वारा जन-जन युग प्रबोधन, जीवन मूल्यों का संदेश व्यक्ति समष्टि निर्माण की प्रेरणा
          इनसे भिन्न ---ज्ञान का लेखन तो -समाचार बाचन,या तुकबंदी ही रह जायगा । अतः काव्य-लेखन के मुख उद्देश्य निम्न होते हैं ...

१.स्वान्त सुखाय...जो ह्रदय से निकली कविता होती है, प्रेम गीत, भजन आदि परन्तु वही समष्टिगत होने पर प्रांत सुखाय व जन जन सुखाय भी हो जाती है |
२.जन रंजन के साथ स्वान्त सुखाय ....व्यक्तित्व समष्टि निर्माण की प्रेरणा से रचित काव्य सुखानंद, काव्यानंद द्वारा ब्रह्मानंद सुख ...ह्रदय के उद्गारों का बुद्धि व अनुभव के तालमेल से उत्पन्न हुई कविता | खंड-काव्य, महाकाव्य, देशभक्ति के काव्य, प्रसिद्द व्यक्तित्वों धार्मिक-एतिहासिक चरित्रों, दार्शनिक व धार्मिक तत्वों व ग्रंथों की व्याख्या हेतु रचित काव्य... 
३.सामायिक काव्य ...जिसमें कवि अपने देश-धर्म-काल के नागरिक दायित्व को पूर्ण करता है..यथा मनोरंजन पूर्ण काव्य, सामयिक शौर्य गाथाएँ, राजनीति आदि पर आधारित काव्य...

        आज सूचना युग में सारा ज्ञान कंप्यूटर से मिलजाने के कारण  इलेक्ट्रोनिक मीडिया ,दूर दर्शन आदि से सुखानंद प्राप्ति व उपभोक्तावादी संस्कृति के प्रभाव से उपरोक्त तीनों प्रयोजन निष्प्रभावी होजाने से कविता की समाज में निष्प्रभाविता बढ़ी है।
             प्रायः यह कहा जाने लगा है कि कवि को भी बाज़ार, प्रचार आदि  के आधुनिक हथकंडे अपनाने होंगे परन्तु प्रश्न है कि यदि कवि यह सब करने लगे तो वह ह्रदय से उदभूत कविता कैसे रचेगा? वह भी व्यापारी नहीं बन जायगा? क्या स्वयं समाज का कविता,कवि समाज के व्यापक हित के प्रति कोई कर्तव्य नहीं है ? ताली दौनों हाथों से बज़ती है।

काव्य -- मानवीय सृजन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण
             काव्य मानव-मन की संवेदनाओं का बौद्धिक सम्प्रेषण है--मानवीय सृजन में सर्वाधिक कठिन रहस्यपूर्ण ; क्योंकि काव्य अंतःकरण के अभी अवयवों ---चित्त (स्मृति धारणा ), मन ( संकल्प ), बुद्धि ( मूल्यांकन ), अहं ( आत्मबोध ) स्वत्व (अनुभव भाव ) आदि सभी के सामंजस्य से उत्पन्न होता है |  तभी वह युगांतरकारी, युगसत्य, जन सम्प्रेषणीय, विराट-सत्याग्रही, बौद्धिक विकासकारी सामाजिक चेतना का पुनुरुद्धारक हो पाता है |
        काव्य--- इतिहास, दर्शन या विज्ञान के भांति कोरा कटु यथार्थ होकर मूलरूप से वास्तविक व्यवहार जगत के अनुसार सत्यं, शिवं, सुन्दरं होता है, तभी उसका कथ्य युगानुरूप के साथ सार्वकालिक सत्य भी होता है|   साहित्यकार  का  दायित्व- नवीन युग-बोध को सही दिशा देना होता है तभी उसकी रचनाएँ कालजयी हो पाती हैं|  आधुनिक सामयिक साहित्य रचना के साथ-साथ ही सनातन एतिहासिक विषयों पर  पुनः-रचनाओं द्वारा  समाज के दर्पण पर जमी धूलि को समय-समय साफ़ करते रहने से समयानुकूल प्रतिबिम्ब नए-नए भाव-रूपों में दृश्यमान होते हैं एवं प्रगति की भूमिका बनते हैं|
         साहित्य काव्य को किसी भाषा , शाखा या गुट-विशेष की रचनाधर्मिता होकर काव्य की समस्त शक्तियों,  भावों,  शब्दों  सम्भावनाओं का उपयोग करना होता है|   प्रवाह लय  काव्य की विशेषताएं हैं जो विषय, भाव सम्प्रेषण-क्षमता एवं समाज की सार्वकालीन  आवश्यकतानुसार प्रत्येक काव्य-विधा में होनी चाहिए चाहे विधा छंदोबद्ध काव्य हो या मुक्त-छंद काव्य | अतः गीत- अगीत, तुकांत-अतुकांत, छंद आदि कोई विवाद का विषय नहीं  होना चाहिए |
काव्य ---सत्यं शिवं सुन्दरम ---

              काव्य ---सौंदर्य-प्रधान हो या सत्य-प्रधान ...इस पर पूर्व पश्चिम के विद्वानों में मतभेद हो सकता है | आचार्यों के अपने अपने  मतभेद तर्क हैं|  सृष्टि की प्रत्येक वस्तु भाव, कर्म की भाँति...काव्य-कविता समस्त साहित्य को भी " सत्यं शिवं सुन्दरम " होना चाहिए | साहित्य का कार्य सिर्फ मनोरंजन   होकर जन-रंजन के रूप में समाज को एक दिशा देना होता है और सत्य के बिना कोई दिशा..दिशा नहीं हो सकती | सिर्फ कलापक्ष को सजाने हेतु एतिहासिक, भौगोलिक तथ्यात्मक सत्य को अनदेखा नहीं करना चाहिए |
स्वतः स्फूर्त रचना,स्वांत-सुखाय व सर्वग्राही --- होती है | रचनाकार को वह सद्य-प्रसूता जननी की भांति सृजन की सुखानुभूति देती है | उसके अंतर के पुरुष-तत्व के अहं की तुष्टि करती है | आदि-सृष्टि की रचना  भी तो उस परम-तत्व, आदि-सृष्टा की स्वतः स्फूर्त स्वांत-सुखाय, सृजन-प्रवृत्ति की सुखानुभूति एवं 'एकोहं बहुस्याम '  के ईषत-अहं की तुष्टि ही है | इसी से सृजन -धर्मिता ..असत से सत की ओर प्रस्फुटित होती है | जब सुधीजन उस रचना को अपने-अपने दृष्टिकोण से परखते हैं तभी वह रचना सर्वांत-सुखाय  सर्वग्राही भी हो पाती है |

        ब्लॉग जगत में स्वतंत्र अभिव्यक्ति हेतु मुफ्त लेखन की सुविधा होने से अनेकानेक  ब्लॉग आ रहे हैं एवं नए-नए  व युवा कवि अपने आप  को प्रस्तुत कर रहे हैं ....हिन्दी व भाषा एवं  समाज के लिए गौरव और प्रगति-प्रवाह की बात है ......परन्तु इसके साथ ही यह भी प्रदर्शित होरहा है कि .....कविता में लय, गति, लिंगभेद, विषय भाव का गठन, तार्किकता,  देश-काल, एतिहासिक तथ्यों आदि  की अनदेखी  की जारही है जिसके जो मन में आरहा है तुकबंदी किये जारहा है | जो काव्य-कला में गिरावट का कारण बन सकता है|
             
यद्यपि कविता ह्रदय की भावाव्यक्ति है उसे सिखाया नहीं जा सकता ..परन्तु भाषा एवं व्याकरण व सम्बंधित विषय का उचित ज्ञान व अनुभव काव्य-कला को सम्पूर्णता प्रदान करता है शास्त्रीय-छांदस कविता में सभी छंदों के विशिष्ट नियम होते हैं अतः वह तो काफी बाद की व अनुभव -ज्ञान की बात है  परन्तु प्रत्येक नव व युवा कवि को कविता के बारे में कुछ  सामान्य ज्ञान की छोटी छोटी मूल बातें तो आनी  ही चाहिए |   कुछ  सहज सामान्य प्रारंभिक बिंदु  नीचे दिए जा रहे हैं, शायद नवान्तुकों व अन्य जिज्ञासुओं के लिए सार्थक हो सकें ....
(
अ) -अतुकांत कविता में- यद्यपि तुकांत या अन्त्यानुप्रास नहीं होता परन्तु उचित गति, यति  व लय अवश्य होना चाहिए...यूंही कहानी या कथा की भांति नहीं होना चाहिए.....वही शब्द या शब्द-समूह बार-बार आने से सौंदर्य नष्ट होता है....यथा ..निरालाजी की प्रसिद्ध कविता.....
"
अबे सुन बे गुलाव ,
भूल  मत गर पाई, खुशबू रंगो-आब;
खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट,
डाल पर इतरा रहा -
कैपीटलिस्ट ||"
()- तुकांत कविता / गीत आदि  में--जिनके अंत में प्रत्येक पंक्ति  या पंक्ति युगल आदि में (छंदीय गति के अनुसार)  तुक या अन्त्यानुप्रास समान होता है...
-- मात्रायें -- तुकांत कविता की प्रत्येक पंक्ति में सामान मात्राएँ होनी चाहिए मुख्य प्रारंभिक वाक्यांश, प्रथम  पंक्ति ( मुखडा ) की मात्राएँ गिन कर  उतनी ही समान मात्राएँ प्रत्येक पंक्ति में रखी जानी चाहिए....यथा ..

 "
कर्म      प्रधान      जगत      में    जग   में,  =१६ मात्राएँ 
 (
२+१ , १+२+१ १+१+१ १+१ ,   =१६)
 
प्रथम       पूज्य    हे     सिद्धि     विनायक  |  = १६.
(
१+१ +१२+१,    ,   २+१ ,     १+२+१+१   =१६ )
 
कृपा       करो       हे       बुद्धि      विधाता ,         = १६ 
(
१+२ ,   १+२ ,     ,      २+१     १ +२ +२     =१६  )
 
रिद्धि       सिद्धि      दाता         गणनायक ||   =  १६
(
२+१,      २+१ ,     २+२ ,       १+१+२+१+१  =१६ )

-लिंग ( स्त्रीलिंग-पुल्लिंग )---कर्ता व कर्मानुसार.....उसके अनुसार उसी  लिंग का प्रयोग हो.... यथा ....
       "
जीवन  हर वक्त लिए एक छड़ी होती  है "  ----यहाँ  क्रिया -लिए ..कर्ता  जीवन का व्यापार   है..न कि छड़ी  का  जो समझ कर  'होती है लिखा गया ----अतः या तो ....जीवन हर वक्त लिए एक छड़ी होता है ....होना चाहिए ...या  ..जिंदगी  हर वक्त लिए एक छड़ी होती है ...होना चाहिए |
- इसी प्रकार ..काव्य- विषय का --काल-कथानक का समय  (टेंस ), विषय-भाव ( सब्जेक्ट-थीम ), भाव (सब्सटेंस),   विषय क्रमिकतातार्किकता, एतिहासिक तथ्यों की सत्यताविश्व-मान्य सत्यों-तथ्यों-कथ्यों  ( यूनीवर्सल ट्रुथ ) का ध्यान रखा जाना चाहिए....बस .....|
४-- लंबी कविता में ...मूल कथानक, विषय-उद्देश्य, तथ्य व देश-काल  ....एक ही रहने चाहिए ..बदलने नहीं चाहिए .....उसी मूल कथ्य व उद्देश्य को विभिन्न उदाहरणों व कथ्यों से परिपुष्ट करना एक भिन्न बात है ...जो विषय को स्पष्टता प्रदान करते  हैं  ....

                           -
और सबसे बड़ा नियम यह है कि ...स्थापित, वरिष्ठ, महान, प्रात:-स्मरणीय ...कवियों की सेकडों  रचनाएँ  ..बार-बार पढना, मनन करना  व उनके कला व भाव का अनुसरण करना .......उनके अनुभव व रचना पर ही बाद में आगे शास्त्रीय नियम बनते हैं......


 आज कल काव्य की विंडम्बना.....
        मुझे लगता है यह विडम्बना ही है ... कि एक ओर तो हम एकाक्षरी-द्व्याक्षरी आदि छंद के रूप में हर छंद आखर-शब्द को ही छंद मानते हैं ....बालक द्वारा प्रथम शब्द..माँ ..एक छंद ही है आदि आदि .....दूसरी ओर मुक्त छंद, अतुकांत छंद आदि को अछूत | वस्तुतः हमारी सनातन छंद परम्परा तो देववाणी संस्कृति के अतुकांत छंदों से ही है | जब संस्कृत भाषा ज्ञान के तप, साधना, व धैर्य की कमी के कारण तालबद्धता व संगीतमयता की विलुप्ति से संस्कृत का जन साधारण द्वरा प्रयोग में ह्रास हुआ, जनभाषा प्राकृत व अपभ्रंश से होते हुए हिन्दी तक आई तो तुकांत छंदों का आविर्भाव हुआ और तुकांत कविता मुख्य हुई | परन्तु हिन्दी साहित्यकारों द्वारा मुक्त छंद काव्य व अतुकांत रचनाओं की प्रस्तुति भी होती रही| मैथिली शरण गुप्त जी के खंडकाव्यसिद्धराज में देखें

तो फिर-
सिद्धराज क्या हुआ
मर गया हाय,
तुम पापी प्रेत उसके | 

           छंद क्या है --- वे जो सिर्फ छंदोबद्ध कविता ही की बात करते हैं, वस्तुतः छंद, कविता, काव्य-कला साहित्य का अर्थ ठीक प्रकार से नहीं जानते-समझते एवं संकुचित अर्थ विचार धारा के पोषक