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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

शुक्रवार, 28 मार्च 2014

रामचरित मानस, हनुमान व बरमूडा ट्राई एंगल ...डा श्याम गुप्त....

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...




  रामचरित मानस में एक विशिष्ट प्रसंग है ....चौपाई है....
              ‘ निशचरि  एक सिन्धु महं रहई, करि माया नभ के खग गहई|’
              जीव  जीव जंतु जो गगन उड़ाहीं, जल विलोकि तिनकी परिछाही |                            गहहि छाँह सक सो न उड़ा ही, एहि बिधि सदा गगनचर खाई |

        हनुमान जी जब सीता की खोज में लंका प्रयाण के समय सागर के ऊपर से उड़ रहे थे तो समुद्र के अन्दर रहने वाली मायावी राक्षसी ने उन्हें उनकी छाया द्वारा पकड़ना चाहा जैसा कि वह सदैव ही करती थी आकाश में उड़ते हुए पक्षियों को उनके छाया से ही वास्तव में पकड़कर अपना भोजन बनाती थी | यह अत्यंत उच्च वैज्ञानिक ज्ञान के प्रयोग का प्रसंग है |हनुमान जी  द्वारा उसे मार देने पर क्या उसी राक्षसी का परिवार ही तो वहां से भागकर आज के बरमूडा ट्राई एंगल...के सागरीय क्षेत्र में निवास नहीं कर रहा जो उड़ते हुए विमानों एवं सागर तल पर तैरते हुए जलयानों को खींच लेता है |
              

मंगलवार, 25 मार्च 2014

डा श्याम गुप्त एवं सुषमा गुप्ता का नवीनतम प्रकाशित ब्रज भाषा काव्य संग्रह " ब्रज बांसुरी "...डा श्याम गुप्त ...

                                ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                     डा श्याम गुप्त एवं सुषमा गुप्ता का  नवीनतम प्रकाशित ब्रज भाषा काव्य संग्रह " ब्रज बांसुरी ".......



लेखिका परिचय

समर्पण

पिताजी का संग्रहीत एक गीत

डा रामाश्रय सविता

भूमिका-

भूमिका

रविवार, 23 मार्च 2014

होली के दृश्य ...रेलगाडी से ..डा श्याम गुप्त.....

                                     ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



होली के दृश्य ...रेलगाडी से ..

होली की पर्व मूलतः भारतवर्ष का ऋतु-परिवर्तन, पर्यावरण एवं फसल पकने की आनंद लहर का पर्व है जब हर घर, गाँव, वर्ग, जाति एक होजाते हैं और गाँव गाँव, गली-गली, घर-चौबारे, चौपाल, आँगन-आँगन, छोटे-बड़े, स्त्री-पुरुष, बड़े-बूढ़े सभी एक ही उल्लास व उत्साह, उमंग में खोजाते हैं |

        आवश्यक घटनावश मेरा इस वर्ष की होली का पूरा दिवस रेलगाडी में ही बीता, तो मैंने वहीं से दृष्टिगत होते हुए होली के नज़ारे मोबाइल-कैमरे में कैद करने शुरू कर दिए | आनंद लीजिये.....




मंदिर चौबारे होली

दिबियापुर के निकट होली

खेतों फूली सरसों
रेल लाइन के किनारे होली
पटरी किनारे झुग्गियों में होली
कानपुर बाज़ार में होली की हलचल
झुग्गी-झौंपडियों में भी होली
गंगा किनारे होली
गंगा में नावों पर होली के रंग
गंगाघाट कानपुर -होली की बहार

११ देवर फिर गए गयी जेठ के संग ...फूली-अरहर






         

शुक्रवार, 14 मार्च 2014

आगरा में सरोजिनी नायडू चिकित्सा महाविद्यालय के १९६४ बैच के चिकित्सकों द्वारा स्वर्ण-जयन्ती समारोह का आयोजन ..डा श्याम गुप्त

.                                      ...कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                                आगरा महानगर में सरोजिनी नायडू चिकित्सा महाविद्यालय के १९६४ बैच के चिकित्सकों  द्वारा  ८/९.मार्च  २०१४   को अपने बैच की स्वर्ण जयन्ती समारोह का आयोजन किया गया | देश –विदेश से पधारे दुनिया भर में फैले चिकित्सकों ने पत्नियों व पतियों सहित आयोजन में बढ़ चढ़ कर भाग लिया एवं विभिन्न रंगारंग सांस्कृतिक आयोजनों व होली के अवसर पर फाल्गुनी महोत्सव में भी खूब रंगारंग आयोजन का आनंद लिया|



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मथुरा, (राधा-कृष्ण के जन्म व लीलाधाम ..गोकुल, बरसाना, वृन्दावन, महावन आदि ) आगरा, भरतपुर का त्रिकोणीय क्षेत्र भारत के ब्रज-क्षेत्र के रूप में जाना जाता है जो फाल्गुनी बयार के रंगारंग आयोजनों व प्रथाओं का उद्घाटक सर्वप्रथम व प्राचीनतम मूलक्षेत्र के रूप में इतिहास में एवं विश्व में प्रसिद्द है | ब्रज-धाम.. कृष्ण-राधा की बाल-लीलाएं, गोप-गोपिकाओं, राधा-कृष्ण के प्रेम, रास-क्रीडाएं, एवं विविध फाल्गुनी क्रीडाओं आदि के लिए विश्व प्रसिद्द है …..बरसाने की लठामार होली को आज विश्व में कौन नहीं जानता | आगरा महानगर इस ब्रज-क्षेत्र जिसे सांस्कृतिक,धार्मिक, दार्शनिक रूप से महानतम व ईश्वरीय धाम कहा जता है इस त्रिकोण का केंद्र है | 

        समारोह का आयोजन आगरा स्थित १९६४ बैच के चिकित्सकों ..डा संध्या अग्रवाल, प्रोफ.स्त्री-चिकित्सा विज्ञान, डा सुरेश कपूर, डा संजय टंडन, डा अरविंद कुंटे एवं डा बी एम् अग्रवाल द्वारा  आगरा स्थित सभी १९६४ बैच के चिकित्सकों के सहयोग से स्थानीय ग्रांड होटल में किया गया |

डा व्यास , डा पी एन सिंह एवं त्रिलोकी नाथ का 
श्रीमती नयना व्यास के गायन पर नृत्य
 
 
 
चिकित्सकों व पत्नियों का नृत्य 


डा संध्या अग्रवाल  एवं डा सुरेश कपूर समारोह का प्रारम्भ करते हुए
१९६४ बैच के छात्र चिकित्सक



विचार विमर्श व परिचय

लखनऊ के डा एस बी गुप्ता विचार प्रकट करते हुए


परिचय


कालिज के रखरखाव पर चिंता एवं समाधान खोजते हुए पूर्व  चिकित्सक छात्र









              


      

        

           

 

 




डा एस एन अग्रवाल का कविता पाठ

श्रीमती नयना व्यास का गायन

        द्वितीय सत्र शाम को बोम्बे से आए हुए डा नवीन व्यास एवं श्रीमती नयना व्यास के सुमधुर गायन से प्रारम्भ हुआ | चिकित्सकों एवं पत्नियों ने गीत, ग़ज़ल, कविता एवं नृत्य द्वारा कार्यक्रम को रंगारंग कर दिया | गीतों की धुनों पर चिकित्सक गण खूब थिरके | फूलों की होली एवं श्रीमती सुषमा गुप्ता के वरसाने की लठामार होली गायन एवं नृत्य के साथ इस सत्र का समापन हुआ | 

डा एस बी गुप्ता की ग़ज़ल..लो आज छेड़ ही देते हैं उस फ़साने को."

         
फूलों की होली








  
सुषमा गुप्ता का लठामार होली गायन मैं तो खेलूंगी श्याम संग होरी...


  
गुरु वन्दना 

 
श्रीमती नयना व्यासका गायन

         द्वितीय दिवस दि ९.३.१४ को गुरु वन्दना से कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ | इलाहाबाद चिकित्सा महाविद्यालय के पूर्व प्रोफ डा ओ पी गुप्ता सभी पुराने साथियों के छात्रकाल के चित्रों को अपने लेपटाप में सहेजकर लाये थे  ..उसका प्रदर्शन किया गया एवं सभी का अपने पुराने चित्र के साथ अपने विचार एवं संस्मरण आदि सुनाते हुए स्मृति-चित्र निर्मित किये गए| सभी साथियों को स्मृति-चिन्ह व भेंट प्रदान के पश्चात  पुनः सम्मिलन की इच्छा व आशा लिए श्रीमती नयना व्यास द्वारा वन्देमातरम गीत के साथ समारोह का समापन हुआ |
डा एस बी गुप्ता एवं सुषमा गुप्ता...वो चंद पल जो तेरे साथ गुजारे हमने..."

डा संध्या अग्रवाल अपने चित्र के साथ





गुरुवार, 13 मार्च 2014

प्रेम अगीत.....

                                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

१.

गीत तुम्हारे मैंने गाये

अश्रु नयन में भर भर आये |

याद तुम्हारी घिर घिर आयी,

गीत नहीं बन पाए मेरे |

अब तो तेरी ही सरगम पर,

मेरे गीत ढला करते हैं|

मेरे ही रस छंद भाव सब,

मुझसे ही होगये पराये ||

२.

श्रेष्ठ कला का जो मंदिर था

तेरे गीत सजा मेरा मन |

प्रियतम तेरी विरह पीर में,

पतझड़ सा वीरान होगया |

जैसे धुन्धलाये शब्दों की ,

धुंधले अर्ध मिटे चित्रों की ,

कलावीथिका एक पुरानी  ||

३.

तुम जो सदा कहा करती थीं ,

मीत सदा मेरे बन रहना |

तुमने ही मुख फेर लिया क्यों,

मैंने तो कुछ नहीं कहा था |

शायद तुमको नहीं पता था ,

मीत भला कहते हैं किसको |

मीत शब्द को नहीं पढ़ा था,

तुमने मन के शब्द कोष में ||

४.

बालू से सागर के तट पर,

खूब घरोंदे गए उकेरे |

वक्त की ऊंची लहर उठी जब,

सब कुछ आकर बहा लेगयी

छोड़ गयी कुछ घोंघे-सीपी ,

सजा लिए हमने दामन में |||