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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

रविवार, 16 जुलाई 2017

ईशोपनिषद के षष्ठ मन्त्र-का काव्य भावानुवाद ---डा श्याम गुप्त....

                     ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



ईशोपनिषद के षष्ठ मन्त्र- यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवा नुपश्यति |
                      सर्व भूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते || ---का काव्य भावानुवाद ...

कुंजिका- यस्तु= जो कोई भी...सर्वाणि = सम्पूर्ण ...भूतानि= चराचर जगत को...आत्मनि एव = आत्मा या परमात्मा में ही ...अनुपश्यति =देखता है ...च सर्वभूतेषु = और सभी चराचर जगत में ...आत्मानं= आत्मा या परमात्मा को ...ततो=इससे वह ...न विजुगुप्सते=भ्रमित नहीं होता, घृणा नहीं करता, निन्दित नहीं होता |

मूलार्थ- जो समस्त विश्व को स्वयं में ही व परमात्मा में ही स्थित देखता है एवं स्वयं व परमात्मा को ही समस्त विश्व में स्थित देखता है वह अपने कर्मों के हेतु भ्रमित नहीं होता न किसी से घृणा करता है अतः संसार में निंदा का पात्र नहीं होता |


सारे जग को अपने जैसा,
अपने को सारे जग जैसा |
जिसने देखा समझा माना,
कब घृणा किसी से कर पाया |

सब भूत जीव जड़ जंगम में,
वह आत्मतत्व उपस्थित है |
उस आत्मतत्व में ही सब कुछ,
यह सकल चराचर स्थित है |

जो जान गया, वह ब्रह्म स्वयं,
कण-कण, पत्ते पत्ते में है |
जग का कण-कण, यह सकल सृष्टि,
अंतर में उसी ब्रह्म के है |

‘मुझ में संसार समाया है’,
यह समझ, आत्मरत होकर भी |
‘मैं व्याप्त सकल जग में असीम’,
परमार्थ भाव युत होजाता |           

वह भ्रमित नहीं होपाता है,
स्पष्ट दृष्टि पाजायेगा |
सांसारिक भ्रम, उलझन, माया,
में उलझ नहीं रह जाएगा |

वह ब्रह्म ह्रदय में स्थित हो,
शुचि प्रेम सुधारस बरसाता |
सब को ही ब्रह्म समझलें यदि,
सब विश्व प्रेममय होजाता |

नर आत्मतत्व को सुगठित कर,
परमार्थ तत्व लय  होजाए |
मैं ही वह तत्व सनातन हूँ,
यूं भक्तिमार्ग दृढ होजाये |

भक्तिमार्ग पर चलता प्राणी,
कर्मयोग पथ पाजाता है |
उस परम अर्थ को प्राप्त हुआ,
परमार्थ राह अपनाता है |









 

शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

उस गुलाबी धूप का...ग़ज़ल---- डा श्याम गुप्त

                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


उस गुलाबी धूप का...ग़ज़ल----

इक शमा यादों की मन में चाह बन जलती रही,
फिर मुलाकातें भी होंगीं आस इक पलती रही |

उस गुलाबी धूप का क्या वाकया कोई कहे,
जो हमारे आपके थी दरमियाँ छलकी रही |

रूह में छाई हुई इक धुंध वर्फीली उसे,
गुनगुनाया वो पिघलकर गीत बन ढलती रही |

क्या कहें क्या ना हुआ अब उस सुहानी शाम को,
नयन नयनों में ही बातें नेह की चलती रहीं |

नयन नयनों से मुखातिब हुए तो ये क्या हुआ,
मौन की मधुरिम मुखरता रूह में फलती रही |

गुनुगुनाने लग गए कलियाँ बहारें चमन सब,
शोखियाँ अठखेलियाँ तन मन को यूं छलती रहीं |

धूप अपने दरमियां जो उस अजानी शाम थी,
नयन से होठों पे आने से सदा टलती रही |

आ न पायी नयन से ओठों पे वो धुन प्रीति की
श्याम’ इक मीठी व्यथा बन हाथ यूं मलती रही ||


 

सोमवार, 10 जुलाई 2017

बहुआयामी साहित्यकार डा श्यामगुप्त** ---ले.साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य ....

                                   ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

 बहुआयामी साहित्यकार डा श्यामगुप्त** ---ले.साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य .....

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                  जीवन व जगत को एक साथ जीने वाले, संवेदनशील, भावुक, कवि हृदय, लखनऊ के वरिष्ठ कवि व साहित्यकार डा श्यामगुप्त एक अनुभवी, प्रतिभावान व सक्षम, वरिष्ठ साहित्यकार हैं जो विज्ञान के छात्र रहे हैं एवं चिकित्सा विज्ञान व शल्यक्रिया-विशेषज्ञता उनका जीविकोपार्जन | डा श्यामगुप्त भारतीय रेलवे की सेवा में चिकित्सक के रूप में देशभर में कार्यरत रहे अतः समाज के विभिन्न वर्गों, अंगों, धर्मों, व्यक्ति व परिवार व समाज की संरचना एवं अंतर्द्वंद्वों को आपने करीब से देखा, जाना व समझा है | वे एक संवेदनशील, विचारशील, तार्किक के साथ साथ सांसारिक-आध्यात्मिक-धार्मिक व नैतिक समन्वय की अभिरूचि पूर्ण साहित्यकार हैं, उनकी रचनाएं व कृतित्व स्वतःस्फूर्त एवं जीवन से भरपूर हैं|
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                         वे साहित्य के प्रत्येक अनुशासन-गद्य व पद्य की सभी विधाओं में समान रूप से रचनारत हैं, साहित्य में सतत सृजनशील हैं तथा अंतर्जाल ( इंटरनेट) पर हिन्दी, ब्रजभाषा एवं अंग्रेज़ी भाषाओं में रचनारत हैं| उनकी अपने स्वयं के विशिष्ट विचार-मंथन के क्रमिक विचार-बिंदु ‘श्याम स्मृति’ के नाम से पत्र-पत्रिकाओं व अंतरजाल पर प्रकाशित होते हैं|
-------- अब तक आपके द्वारा दस प्रकाशित पुस्तकों के अतिरिक्त लगभग २०० गीत, २५० ग़ज़ल, नज़्म, रुबाइयां, कते, शे’र आदि... ३०० अगीत छंद, ६० कथाएं व २०० से अधिक आलेख, स्त्री-विमर्श, वैज्ञानिक-दार्शनिक, सामाजिक, पौराणिक-एतिहासिक विषयों, हिन्दी व साहित्य आदि विविध विषयों पर लिखे जा चुके हैं एवं आप अनेक निवंध, समीक्षाएं, पुस्तकों की भूमिकाएं आदि भी लिख चुके हैं |
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                           बहुआयामी साहित्यकार डा श्यामगुप्त साहित्य की पद्य व गदय की सभी विधाओं उपन्यास, कहानी, समीक्षा, आलेख एवं शास्त्रीय तुकांत छंद, गीत, अतुकांत छंद व गीत तथा अगीत और ग़ज़ल में भी रचनारत हैं| आपने मूलतः खड़ी बोली में साहित्य रचना की है तथा ब्रजभाषा में भी साहित्य रचना करते हैं, अंग्रेज़ी में भी |
----------आपकी कृतियों व रचनाओं से आपके ज्ञान वैविध्य, सतत अध्ययनशीलता, साहित्य में विविधता एवं विषयवस्तु, शैली एवं भाषा में नवीनता के पोषण की ललक परिलक्षित होती है | समाज के सरोकार, जन-जन के उत्थान की ललक, स्व-संस्कृति एवं मानव-सदाचरण के आप पक्षधर हैं जो आपकी प्रत्येक कृति में झलकता है | इसके अतिरिक्त समकालीन परिवेश पर गहन चिंतन-मनन, सूक्ष्म अंतर्दृष्टि तथा व्यष्टि व समष्टि का व्यवहारिक एवं तत्वज्ञान उनकी रचनाओं में समाहित रहता है जो उन्हें एवं उनकी कृतियों को विशिष्टता प्रदान करता है | धर्म, अध्यात्म एवं विविध शास्त्रों के अध्ययन व ज्ञान के झलक भी आपकी सभी रचनाओं में पाई जाती है |
--------- साहित्य में सुस्थापित तत्वों व मानदंडों के साथ-साथ लीक से हटकर कुछ नवीन करते रहना उनका अध्यवसाय है अतः शोध ग्रंथों की भांति आपकी प्रत्येक कृति कुछ न कुछ नवीनता व स्वयं के नवीन विशिष्ट विचार तथा नवीन स्थापनाओं को लिए हुए होती है जो उन्हें अन्य कवियों साहित्यकारों से प्रथक एवं विशिष्ट बनाती है |
---------तीन विशिष्ट काव्य-कृतियाँ, ब्रजभाषा में विविध विधा युत काव्यग्रन्थ, खंडकाव्य का नवीन नामकरण ‘काव्य-उपन्यास, नवीन विषयवस्तु युत उपन्यास इन्द्रधनुष लिखकर वे श्रेष्ठ कवि, लेखक व साहित्यकार तो हैं ही, तुकांत एवं अतुकांत अगीत विधा दोनों में ही नए-नए छंदों की रचना तथा गीति-विधा एवं अगीत-विधा दोनों में ही महाकाव्य एवं खंडकाव्य रचकर वे महाकवि की संज्ञा भी प्राप्त कर चुके हैं |
--------काव्य-शास्त्रीय ग्रन्थ, एक काव्य विधा का सम्पूर्ण लक्षण-ग्रन्थ लिखने पर उन्हें साहित्याचार्य की संज्ञा से भी पुकारा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी | वे सतत रचनारत व साधनारत हैं जो उनके शायरी ग्रन्थ, श्याम स्मृति की स्मृतियाँ रूपी विभिन्न विषयों पर स्व-विचारों की लघु-आलेखों की श्रृखला, कहानियाँ, गीत, सामाजिक, एतिहासिक, नारी विमर्श, चिकित्सकीय, साहित्य व भाषा, शास्त्र व स्व-संस्कृति आदि विविध विषयक आलेखों से ज्ञात होता है | अगीत कविता की साहित्य यात्रा एवं उसके छंद विधान का विस्तृत व शोधपूर्ण वर्णन लक्षण ग्रन्थ ‘अगीत साहित्य दर्पण’ में प्रस्तुत होता है |
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                           अगीत काव्यविधा का लक्षण काव्यग्रंथ एवं सफल उपन्यास इन्द्रधनुष, कथाएं एवं विविध विषयों पर लिखे जा चुके अनेकों आलेख, निवंध, समीक्षाएं, पुस्तकों की भूमिकाएं, के आधार पर गद्य-साहित्य की प्रस्तुति में भी डा श्याम गुप्त एक सफल गद्य-साहित्यकार, उपन्यासकार एवं ग्रंथकार के रूप में प्रस्तुत हुए हैं|
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                          उनके साहित्य के प्रिय मूल विषय हैं ... स्त्री-विमर्श –जिसे वे स्त्री-पुरुष विमर्श का नाम देते हैं, पुरा शास्त्रीय ग्रंथों, वेद, पुराण आदि में उपस्थित वैज्ञानिक ज्ञान व तथ्य, दर्शन, सामाजिक व व्यवहारिक जीवन-संसार के ज्ञान को जनभाषा हिन्दी में लेखन द्वारा समाज व विश्व के सामने लाना, मानव आचरण संवर्धन विषयक आलेख व रचनाएँ जो सम-सामयिक मानव अनाचरण से उत्पन्न सामाजिक कठिनाइयों व बुराइयों को पहचानकर उनका निराकरण भी प्रस्तुत करे, जिसका प्रमाण उनके द्वारा रचित कृति ‘ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद‘ के रूप में है |
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              डा श्यामगुप्त की साहित्यिक दृष्टि व काव्य-प्रयोजन मूलतः नवीनता के प्रति ललक एवं रूढ़िवादिता के विरोध की दृष्टि है| साहित्य के मूलगुण-भाव-प्रवणता, सामाजिक सरोकार, जन आचरण संवर्धन हेतु प्रत्येक प्रकार की प्रगतिशीलता, नवीनता के संचरण व गति-प्रगति के वे पक्षधर हैं|
------ कविता के मूलगुण -गेयता, लयवद्धता, प्रवाह व गति एवं सहज सम्प्रेषणीयता के समर्थन के साथ-साथ केवल छंदीय कविता, केवल सनातनी छंद, गूढ़ शास्त्रीयता, अतिवादी रूढ़िवादिता व लीक पर ही चलने के वे हामी नहीं हैं|
-------अपने इसी गुण के कारण वे आज की नवीन व प्रगतिशील काव्य-विधा अगीत-कविता की और आकर्षित हुए एवं स्वयं एक समर्थ गीतकार व छंदीय कविता में पारंगत होते हुए भी तत्कालीन काव्यजगत के छंदीय कविता में रूढिगतिता के ठेके सजाये हुए स्वघोषित स्वपोषित संस्थाओं व उनके अधीक्षकों के अप्रगतिशील क्रियाकलापों एवं तमाम विरोधों के बावजूद अगीत-कविता विधा को प्रश्रय देते रहे एवं उसकी प्रगति हेतु विविध आवश्यक साहित्यिक कदम भी उठाये जो उनके विषद अगीत-साहित्य के कृतित्व के रूप में सम्मुख आया जिसके कारण आज अगीत कविता साहित्य की एक मुख्यधारा बनकर निखरी है |
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               डा.श्यामगुप्त नवीन प्रयोगों, स्थापनाओं को काव्य, साहित्य व समाज की प्रगति हेतु आवश्यक मानते हैं, परन्तु इसका अर्थ यह भी नहीं की साहित्य व काव्य के मूल उद्देश्यों से विरत कर दिया जाय, नवीनता के नाम पर मात्राओं, पंक्तियों को जोड़-तोड़ कर, विचित्र-विचित्र शब्दाडम्बर, तथ्यविहीन कथ्य, विरोधाभासी देश, काल व तथ्यों को प्रश्रय दिया जाय, यथा वे कहते हैं कि..
‘साहित्य सत्यम शिवम् सुन्दर भाव होना चाहिए,
साहित्य शुभ शुचि ज्ञान पारावार होना चाहिए |’

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                            इस प्रकार डा श्यामगुप्त के सम्पूर्ण काव्य पर अनुशीलक दृष्टि से बोध होता है कि आप एक प्रतिभा संपन्न श्रेष्ठ कवि एवं लेखक हैं | शोध ग्रंथों की भांति आपकी प्रत्येक कृति कुछ न कुछ नवीनता व स्वयं के नवीन विशिष्ट विचार तथा नवीन स्थापनाओं को लिए हुए होती है | नए-नए छंदों की रचना तथा महाकाव्य एवं खंडकाव्य रचकर वे महाकवि की एवं काव्य-शास्त्रीय लक्षण-ग्रन्थ लिखने पर साहित्याचार्य की संज्ञा के भी योग्य सिद्ध होते हैं| वे सतत सृजनशील हैं और आशा है कि भविष्य में और भी कृतियों के प्रणयन से माँ भारती की भण्डार भरेंगे |

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--- साहित्यभूषण डा.रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’, डी.लिट्.
संस्थापक अध्यक्ष, अखिल भारतीय अगीत परिषद् , लखनऊ




गुरुवार, 6 जुलाई 2017

गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी संपन्न ---डा श्याम गुप्त ...

               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी संपन्न \\
प्रत्येक माह के प्रथम गुरूवार को होने वाली काव्यगोष्ठी दि.६-७-१७ गुरूवार को डा श्यामगुप्त के आवास के-३४८, आशियाना, लखनऊ पर संपन्न हुई | गोष्ठी में अगीत परिषद् के अध्यक्ष साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य , नव-सृजन संस्था के अध्यक्ष डा योगेश गुप्त, डा श्याम गुप्त, श्रीमती सुषमा गुप्ता, अनिल किशोर शुक्ल ‘निडर’, श्री रामदेव लाल विभोर महामंत्री काव्य कला संगम , प्राची संस्था के अध्यक्ष डा सुरेश प्रकाश शुक्ल, श्री बिनोद कुमार सिन्हा उपस्थित थे | विशेष अतिथि एवं श्रोता के रूप में रेलवे अस्पताल लखनऊ के पूर्व मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डा. पुरुषोत्तम सिंह एवं पूर्व रेडियो व टीवी सिंगर श्रीमती पुरुषोत्तम सिंह ने गोष्ठी को शोभायमान किया |
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श्री बिनोद सिन्हा द्वारा अपनी कृति –पांडुलिपि में गणेश वंदना पहले लिखे जाने पर चर्चा हुई | सिन्हा जी का कथन था कि उनके विचार से गणेश भगवान हैं अतः वन्दना पहले की जानी चाहिए | श्याम गुप्त का मत था की गणेश प्रथम पूज्य देव हैं परन्तु भगवान् नहीं हैं | इस प्रकरण में ब्रह्म, भगवान् व ईश्वर पर भी संक्षिप्त चर्चा हुई |
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डा.योगेश के अनुसार गणेश प्रथम पूज्य हैं, उनकी प्रथम पूजा विभिन्न धार्मिक आदि कार्यों में तो की ही जानी चाहिए परन्तु साहित्यिक कृतियों में वाग्देवी माँ सरस्वती की ही वन्दना पहले होनी चाहिए | डा श्याम गुप्त ने सहमत होते हुए कहा कि दोनों की वंदना करते समय गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी ‘वन्दे वाणी विनायकौ’ कहा है |
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श्री अनिल किशोर निडर की जिज्ञासा पर डा श्यामगुप्त ने बताया की संयुक्ताक्षर से पूर्व आने वाले लघु अक्षर को मात्रा गणना हेतु दीर्घ माना जाता है |
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बिनोद सिन्हा जी का कथन था की कविता स्वयंभू उद्भूत होती है , यदि सप्रयास लिखा जाय तो ता वह बनावटी कविता ही होती है |
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डा श्याम गुप्त की सद्य प्रकाशित रचना ;ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद; एवं बिनोद कुमार सिन्हा की शीघ्र प्रकाश्य कृति ‘गीता सारांश, अगीत में’ के तादाम्य में गीता पर ईशोपनिषद का प्रभाव दोनों की विषय समनुरूपता पर डा श्यामगुप्त व सिन्हा जी में चर्चा हुई |
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सुप्रसिद्ध दार्शनिक कवि डा योगेश गुप्त ने अपनी कई दार्शनिक रचनायें प्रस्तुत की, अपने अपने नाम को ढूँढने में व्यस्त हम ---

हम सब मानते थे / हमारा नाम ही
पहचान है ,/ और विडम्बना यह थी कि,
हम स्वयं को भी / अपने नाम से ही पहचानते थे |
--------श्री अनिल किशोर शुक्ल निडर ने वर्षा गीत इस प्रकार प्रस्तुत किया---
नभ पर काले बादल छाते,
कभी रंगीले बनकर आते
वसुधा को रसमय कर जाते |
------- श्री बिनोद कुमार सिन्हा ने महाकवि विद्यापति की शब्दावली निहित तान में गिरधर गोपाल का वर्णन किया---
गले वैजन्ती कनक मोर मुकुट अति भावन
अंग गगन सम कान्ति श्यामल श्यामल
अलक भ्रमर सी तिलक कस्तूरी माल सुहावन,
झलक चन्द्र छवि श्यामल गिरिधर गोवर्धन |
------- डा श्याम गुप्त ने वर्षा गीत, श्रृंगार गीत एवं एक ग़ज़ल यूं पढी –
पुरस्कार की तो थी हमको भी चाहत बहुत
मगर कभी शर्त पूरी हम नहीं कर पाए |
--------श्री रामदेव लाल विभोर ने अपनी रचना प्रस्तुत की ----
मर्ज़ एस दावा बेअसर,
नब्ज़ बोले की मीठा ज़हर है |
------- डा सुरेश प्रकाश शुक्ल ने किसान से तादाम्य बिठाते हुए गाया –
किसना होईगे चतुर किसान / पैदा करत हैं गेहूं धान |
गन्ना आलू बोवें नकदी की आशा मा,
आल्हा बिरहा गावैं झूमें चौमासा मा |
------ श्रीमती सुषमा गुप्ता ने पावस गीत सुनाया ...
आई सावन की बहार
बदरिया घिर घिर आये
---------अगीताचार्य डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने कई रचनाये व गीत प्रस्तुत किये, एक मुक्तक देखिये ....
‘शील से बोझिल झुका हो वह नयन है,
हो न सीमा जिस पटल की वह गगन है |
रोकने पर भी न रुकता हो कभी जो ,
नित्य नूतन पंथ शोधे वह चरण है ||
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डा सत्य द्वारा दो शब्द बोलने के अनुरोध पर विशिष्ट अतिथि व श्रोता डा पी सिंह ने कहा आप लोग विज्ञजनों के सान्निध्य का अवसर मिला, काव्य रस का आनंद मिला | श्रीमती सिंह ने रचनाओं की प्रशंसा करते हुए इसे आनंददायक क्षण बताया |
जलपान के उपरांत सुषमा गुप्ता जी के धन्यवाद ज्ञापन के साथ गोष्ठी का समापन हुआ |

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सोमवार, 26 जून 2017

पुस्तक-----ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद ----- पंचम मन्त्र – . डा श्याम गुप्त

                                  ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



ईशोपनिषद के पंचम मन्त्र –
       तदेजति तन्नैजति  तद्दूरे तद्द्वन्तिके  |
       तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्त बाह्यतः ||    का काव्य भावानुवाद....   

कुंजिका- तत=वह ब्रह्म...एज़ति=गति देता है....नैज़ति=स्वयं गति में नहीं आता...तद्दूरे=वह दूर है....तद्द्वंतिके=वह समीप भी है...तद अंतरस्य सर्वस्य =वह सबके अन्दर है...सर्वस्यास्त बाह्यत=सबसे बाहर भी है| 

मूलार्थ - वह ब्रह्म सबको गति देता है परन्तु स्वयं गति में नहीं आता | वह दूर भी है और समीप भी | वह सबके अंतर में स्थित है और सभी को बाहर आवृत्त भी किये हुए है, सब कुछ उसके अन्दर भी स्थित हैं |                   


वह दूर भी है और पास भी है,
चलता भी है, चलता भी नहीं |
वह ब्रह्म स्वयं हलचल से रहित,
जग हलचलमय कर देता है |

सबके अंतर का वासी है,
पर स्वयं सभी से बाहर है |
सब को आच्छादित किये हुए |
सबसे आच्छादित रहता है |

वह अचल अटल गतिहीन स्वयं,
कण कण में गति भर देता है |
जड़ प्रकृति की निष्क्रियता को,
वह सक्रिय सृष्टि कर देता है |

‘एकोsहँ बहुस्याम’ इच्छा-
रूपी ऊर्जा से महाकाश |
ऊर्जस्वित संचारित होता ;
कण-कण में हलचल भर जाती |


 स्थूल-सूक्ष्म सब भूत-प्रकृति ,
जड़-जंगम की उत्पत्ति हेतु |
जब सक्रिय सृष्टि-क्रम बन जाते,
वह स्वयं पूर्ण-क्रम हो जाता|

वह आत्मतत्व स्थित स्थिर,
परमात्मतत्व सर्वत्र व्याप्त |
अदृश्य, दृश्य सबका दृष्टा,
दिक्-काल परे, दिक्-काल व्याप्त |

सबका धारक, सबमें धारित,
निष्कंप सूक्ष्म बहु वेगवान |
परिमित में रहकर अपरिमेय,
वह एक ब्रह्म ही है महान ||



----क्रमश षष्ठ मन्त्र-----