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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

रविवार, 21 जनवरी 2018

पुस्तक-समीक्षा —-जिज्ञासा काव्य-संग्रह ---डा श्यामगुप्त

                                ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



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 पुस्तक-समीक्षा------
समीक्ष्य कृति—-जिज्ञासा काव्य-संग्रह --- रचनाकारश्री प्रेमशंकर शास्त्री ‘बेताव’ ..प्रकाशक—अखिल भारतीय अगीत परिषद्, लखनऊ ..प्रकाशन वर्ष—२०१७ ई....मूल्य -१५०/- समीक्षक---डा श्यामगुप्त
----------
                    श्री प्रेमशंकर शास्त्री बेताब जी द्वारा रचित काव्य संग्रह ‘जिज्ञासा’ का अवगाहन करने का अवसर प्राप्त हुआ | हिन्दी के प्रवक्ता पद पर कार्यरत बेताब जी की हिन्दी साहित्य व काव्य में रूचि स्वाभाविक है | एक शिक्षक होने के नाते सामाजिक सरोकार, मानवीय आचरण एवं उपदेशात्मक भाव कृति में सर्वत्र समाहित हैं|
                      ------आपके पिता व माताजी को समर्पित इस काव्यकृति में छप्पन विविध विषयक एवं विविध प्रकार के छंद युक्त रचनाओं से युक्त इस कृति में कलम, ग्राम-सुधार, मानव आचरण, भाग्य व ईश्वर, हिन्दी की प्रशस्ति, शिक्षक गरिमा, पर्यावरण, स्वच्छता जैसे सांसारिक व दार्शनिक विषयों के साथ साथ सामयिक सन्देश भी सौन्दर्यमयता से वर्णित हैं|
                ------अपनी बात में वे अपने कविकर्म का उद्देश्य व स्वदृष्टि प्रकट करते हैं ,”क्योंकि जो समाज में होरहा है, या होता है, उससे रचनाकार अछूता नहीं रह सकता |’...”इसप्रकार रचनाकार समाज का सजग प्रहरी है
-------कविता का भाव अर्थ व मानव जीवन पर वृहद् प्रभाव पर अपनी दृष्टि बेताब जी प्रारम्भ में ही स्पष्ट कर देते हैं, ---
-’हमेशा दो दिलों को जोड़कर कविता दिखा देती ..”
----इतिहास साक्षी है की काव्य ने समय समय पर समाज व साम्राज्यों की संरचनाओं को प्रभावित किया है |
सरस्वती वन्दना में कवि माँ से मानवता के लिए प्रार्थना करता है-
हम चलें नेक राहों पर, मन शुभ भावों से भरा रहे |’
\
                         माँ की विविध नामों से एवं विविध देवों की वन्दना वही नवीन प्रयोग है जो मैंने अपने महाकाव्यों सृष्टि एवं प्रेमकाव्य में दस दस वन्दनाएँ प्रस्तुत करके किया था |
                ----साहित्यकार बोधक एवं लिखने हेतु विभिन्न विषयों का सांगोपांग समुचित वर्णन रचना ‘कलम की आवाज’ में दिया गया है भाग्य-चक्र में, ‘भाग्य से ही प्रभु वन पथ पर चले “ द्वारा भाग्य को कोसने की अपेक्षा कर्म पर विश्वास जताया गया है | नीति के दोहों में वैज्ञानिकता युक्त शास्त्र सम्मत विविध कर्मों व कर्तव्यों को स्पष्ट किया गया है |
\
                          नारी की अस्मिता किसी भी राष्ट्र का ही पर्याय है | रचना ‘--
 नारी का सम्मान करो, 
मत भारत को बदनाम करो ‘ -----में ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते...’ का भाव ही ध्वनित है |
                     -----भारतीय सम्यक दृष्टि का वैश्विक भाव वर्णन वे इस प्रकार करते हैं--
‘वैसे तो हम समदृष्टा हैं 
धर्म आदि का भेद भुलाकर रखते हैं| ‘------यह निश्चय ही ऋग्वेद के अंतिम मन्त्र ---
..’समानी अकूती समानी हृदयानि वा, 
समामस्तु वो यथा सुसहमति “ ----से तादाम्य करती है | शिक्षक गरिमा की बात शिक्षक लेखक कैसे भूल सकता है, कवि का कहना है कि,’ है गुरुतर भार यही हम पर, ज्ञान की ज्योति जलाने का ..’|
.-----बस मज़ा ही कुछ और है..’ शीर्षक विशेष है जिसमें प्रतिदिन के क्रियाकलापों का सुन्दर वर्णन है ..
लम्बी लम्बी हांकने का, भाभी से हाल पूछने का, मज़ा ही कुछ और है ‘.....
\
प्रकृति की आवाज़ ही कवि को रचना हेतु प्रेरणा देती है—‘
जबसे अलि को सुना गुनगुनाते हुए,
तबसे गाने की मुझसे लगन लग गयी ..’ |
         ------अपने इतिहास व अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कटकर कोई भी राष्ट्र उन्नत नहीं हो सकता | देववाणी संस्कृति हमारी भाषा, संस्कृति व सामाजिक सभ्यता के प्रवाह की मूल सलिला है | कविवर बेताब आव्हान करते हैं—‘संस्कार की जननी है देववाणी, 
इसका गौरव भी सबको बता दीजिये |
-----------कृति की शीर्षक रचना ‘जिज्ञासा’ में कृति को माँ सरस्वती की अनुकम्पा घोषित करते हुए कविवर प्रेमशंकर बेताब जी अपने कृतित्व से संतुष्ट हैं, वे कहते हैं—“मुराद रही जो मन में मन भर, अब तो पूरी हुई सही |’..यह कवि का आशावाद है, स्वयं पर आत्मविश्वास |
\
                           कृति की भाषा मूलतः सरल सामान्य बोलचाल की खड़ीबोली हिन्दी है, जो स्पष्ट भावसम्प्रेषण में समर्थ है | यथानुसार देशज, उर्दू, अंग्रेज़ी, संस्कृत के शब्द भी प्रयुक्त हैं| रचना ‘चक्कर स्वारथ का देखौ’...में अवधी का प्रयोग हुआ है | शैली सहज सरल प्रवाहयुक्त व अभिधात्मक है कथ्यशैली मूलतः उपदेशात्मक है, यथा विषयानुसार दार्शनिक व वर्णानात्मक भी है | रस, अलंकार भी आवश्यकतानुसार प्रयोग हुए हैं| सदाचार की अगम नदी में –रूपक, मोती सा चमकाती हूँ में उपमा एवं गेहूं घुन जस खाय, में उत्प्रेक्षा अलंकार की सुन्दरता है | अगर जरूरत पडी देश को, अपना लहू बहा देंगे में बीररस एवं भाभी से हाल पूछने का, मज़ा ही कुछ और है में मर्यादित श्रृंगार है |
--------सभी प्रकार के प्रचलित गीत बन्दों एवं दोहा, कुण्डली, घनाक्षरी, सोरठा, पद आदि छंदों का प्रयोग किया गया है –एक सुन्दर कला व भाव युक्त मनहरण कवित्त देखें—
भाव की, भाषा छंद की, प्रगाढ़ गाढ़ ज्ञान की ,
मधु मंद रव की पुकार भर दीजिये
रचना डाकिया में अतुकांत छंद का भी प्रयोग किया गया है ..’औरों की चिंता में डूबा,/ प्राणों से ज्यादा चिट्ठियों का ख्याल,/ यही है उसका हाल,/ आखिर वह कौन / डाकिया, डाकिया |
\
                     इस प्रकार विषय, भाव व कलापक्ष के यथारूप सौन्दर्य से निमज्जित यह कलाकृति जिज्ञासा सुन्दर व सफल कृति है जिसके लिए श्री प्रेमशंकर शास्त्री बेताब जी बधाई के पात्र हैं|


दिनांक-१९ जनवरी, २०१८ ई.                                                                  डा श्यामगुप्त
सुश्यानिदी, के ३४८, आशियाना,                                                  एमबीबीएस, एमएस ( सर्जन )
लखनऊ-२२६०१२.                                                                 हिन्दी साहित्यविभूषण, साहित्याचार्य...
मो. ९४१५१५६४६४






मंगलवार, 16 जनवरी 2018

मेरे पांच पांच अगीत ----डा श्याम गुप्त ....

                            ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 

मेरे पांच पांच अगीत ----
१.
अमर
====
"मरणोपरांत जीव,
यद्यपि मुक्त होजाता है ,
संसार से , पर--
कैद रहता है वह मन में ,
आत्मीयों के याद रूपी बंधन में ,
और होजाता है,
अमर | "

२.
बंधन-मुक्ति
======
वह बंधन में थी,
धर्म संस्कृति सुसंस्कारों का
चोला ओढ़कर,
अब वह मुक्त है, स्वतंत्र है
लाज व शर्मो-हया के वस्त्रों का
चोला छोड़कर |
३.
कालपात्र
=====
किसलिए काल
रचता है रचनाएँ
सम-सामयिक, तात्कालिक,
व सामयिक इतिहास के
सरोकारों को निबद्ध करता है ,
तथ्यों को बद्ध करता है |
एक कालपात्र होता है
साहित्य
तभी वह होता है कालजयी |
४.
अनास्था
======
अपना दोष
ईश्वर के सिर
इंसान क्यों है इतना तंग नज़र !
क्या केवल कुछ पाने की इच्छा से थी, भक्ति-
नहीं थी आस्था, बस आसक्ति |
जो कष्टों के एक झटके से ही
टूट जाए ,
वह अनास्था
आस्था कब कहलाये |
५.
अर्थ
=====
अर्थ स्वयं में एक अनर्थ है |
मन में भय चिंता भ्रम की
उत्पत्ति में समर्थ है |
इसकी प्राप्ति, रक्षण व उपयोग में भी
करना पड़ता है कठोर श्रम,
आज है, कल होगा या नहीं या होगा नष्ट
इसका नहीं है कोइ निश्चित क्रम|
अर्थ मानव के पतन में समर्थ है,
फिर भी जीवन के -
सभी अर्थों का अर्थ है |
\\


 

सोमवार, 15 जनवरी 2018

गाजीपुर--गाधिपुर -गाधि ऋषि की पुरी--- डा श्याम गुप्त

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गाजीपुर--गाधिपुर -गाधि ऋषि की पुरी---
=========================
यह वास्तव में पौराणिक गाधिपुरी है | ब्रह्मर्षि विश्वामित्र व भगवान परशुराम दोनों की लीलास्थली, बिगड़ते हुए मुस्लिम काल में गाजीपुर होगया |
--------राजा कुश (पौराणिक, राम के पुत्र नहीं, शायद जिनके नाम पर आज के अफ्रीका का नाम कुशद्वीप पडा ) के पुत्र राजा कुशनाभ के पुत्र महर्षि गाधि के पुत्र थे ब्रह्मर्षि विश्वामित्र जिनका नाम कौशिक था, इनका किला भी यहाँ अवस्थित है | नज़दीक ही बक्सर में उनकी तपस्थली है जो पहले गाधिपुरम जनपद में थी अब बिहार में है |
------ महाराजा गाधि की पुत्री सत्यवती (पत्नी र्रिचीक भृगु-- पौराणिक---महाभारत की नहीं ) के पुत्र ऋषि जमदग्नि के पुत्र थे महर्षि परशुराम | भगवान परशुराम गंगा जी के पावन तट पर गाजीपुर जनपद के जमदग्नियां ( ऋषि जमदग्नि की पुरी, आज का –जमांनिया, जो विश्व प्रसिद्द हिन्दी उपन्यास चन्द्रकान्ता के एक मुख्य पात्र शिवदत्त का प्रसिद्द नगर है ) नामक स्थान पर पैदा हुए थे। यह उनकी जन्मभूमि के साथ कर्म भूमि भी रही | यहाँ से लगभग 90 किमी0 की दूरी पर सहस्राव (आज का सासाराम-बिहार ) सहस्रार्जुन की छावनी था|
--------- इस जनपद की पावन भूमि पर महर्षि गौतम, यमदग्नि, परसुराम व विश्वामित्र के आश्रम थे, निकट ही बलिया में भ्रगु का आश्रम भी था | इसी भूमि पर एक मदन वन नामक स्थान भी है जहां शायद मेनका प्रसंग व रम्भा श्राप की घटना हुई |
--------परशुराम तन्त्र से एक श्लोक है --
फिरंगा यवनाश्चीनाः खुरासानाश्य म्लेच्छजाः।
राम भक्तं प्रद्रष्टैव त्रस्यन्ति प्रणमन्ति च।।
---अर्थात-- भगवान परशुराम ने भारतवर्ष से बाहर यूरोप, चीन, खुरासान आदि अनेक देश के शासकों को परास्त किया था। वहां के निवासियों पर उनका इतना दर व प्रभाव था कि वे लोग भगवान परशुराम के अनुयायी होने की जानकारी होते ही त्रस्त होकर उन्हें प्रणाम करने लगते थे।
----------आज यहाँ समस्त पाप तारिणी माँ गंगा के तट पर स्थित एशिया की सबसे बड़ी अफीम फेक्ट्री की जमीन पर खड़े होकर में उस दिव्य युग के क्षेत्र गाधिपुर की इस भूमि को श्रृद्धा नमन करता हूँ |


गीत, अगीत और नवगीत...डा श्याम गुप्त

                                ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


गीत, अगीत और नवगीत
===========================
आजकल हिन्दी साहित्य व काव्य में पद्य-विधा के सनातन रूप गीत के दो अन्य रूप अगीत एवं नवगीत काफी प्रचलन में हैं | --------गद्य-विधा से भिन्नता के रूप में जिस कथ्य में, लय के साथ गति व यति का उचित समन्वय एवं प्रवाह हो वह काव्य है,गीत है|
------तुकांत छंदों के अतिरिक्त, अन्त्यानुप्रास के अनुसार गीत- तुकांत या अतुकांत होते हैं | अतुकांत गीतों को गद्य-गीत भी कहा गया | गीत तो सनातन व सार्वकालिक है ही अतः आगे कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं है|
--------यहाँ अगीत व नवगीत पर कुछ दृष्टि डालने का प्रयत्न किया जायगा|
अगीत ---
************
-----एक अतुकांत गीत है, जिसमें मूलतः संक्षिप्तता को ग्रहण किया गया है | निराला जी द्वारा स्थापित लम्बे-लम्बे अतुकांत गीतों से भिन्न ये ५ से ८ पंक्तियों में पूरी बात कहने में सक्षम हैं | लय, गति, यति के साथ प्रवाह इनकी विशेषता है जो इन्हें गीतों की श्रेणी में खडा करती है एवं अतुकान्तता पारंपरिक पद्य-गीत से पृथक करती है और संक्षिप्तता प्रचलित पारंपरिक अतुकांत गीतों से भिन्नता प्रदर्शित करती है | इस प्रकार अगीत एक स्वतंत्र व स्पष्ट विधा है एवं उसका का एक स्पष्ट तथ्य-विधान, लिखित शास्त्रीय ग्रन्थ में छंद विधान व रचना संसार है ...उदाहरणार्थ ---
“टूट रहा मन का विश्वास
संकोची हैं सारी
मन की रेखाएं |
रोक रहीं मुझ को,
गहरी बाधाएं |
अन्धकार और बढ़ रहा,
उलट रहा सारा आकाश ||” --- डा रंगनाथ मिश्र सत्य
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\
नवगीत व उसका भ्रामक संसार ---गीत का सलाद या खिचड़ी----
*****************************
--- नवगीत की बात काफी समय से एवं काफी जोर-शोर से कही जा रही है| नवगीत को प्राय: गीत के नवीन एवं आधुनिक स्थानापन्न रूप में प्रचारित किया जाता है|
------नवगीतकार प्रायः यह कहते हैं कि अब गीत पुरानी विधा होगई है नवगीत का युग है | परन्तु यदि ध्यान से विश्लेषण किया जाय तो यह एक भ्रांत धारणा ही है |
-------वस्तुतः नवगीत कोई नवीन विधानात्मक तथ्य नहीं है अपितु पारंपरिक गीत को ही तोड़-ताड़ कर लिख दिया जाता है | इसमें मूलतः तो तुकांतता का ही निर्वाह होता है और मात्राएँ भी लगभग सम ही होती हैं, कभी-कभी मात्राएँ असमान व अतुकांत पद भी आजाता है | इसे गीत का सलाद या खिचडी भी कहा जा सकता है |
------ इसका स्पष्ट तथ्य-विधान भी नहीं मिलता | वस्तुतः यह है पारंपरिक गीत ही जिसे टुकड़ों में बाँट कर लिख दिया जाता है | उदाहरणार्थ---- एक नवगीत है—
“जग ने जितना दिया
ले लिया
उससे कई गुना
बिन मांगे जीवन में
अपने पन का
जाल बुना |
सबके हाथ-पाँव बन
सब की साधें
शीश धरे
जीते जीते
सबके सपने
हर पल रहे मरे
थोपा गया
माथ पर पर्वत
हमने कहाँ चुना | --मधुकर अस्थाना का नवगीत
-------इसे १२-१४ या १६-१० या २६ पंक्तियों वाला सामान्य गीत की भाँति लिखा जा सकताहै –-
जग ने जितना दिया, ११
लेलिया उससे कई गुना | १५
बिन मांगे जीवन में, १२
अपने पन का जाल बुना |१४
या -----
जग ने जितना दिया, लेलिया उससे कई गुना, २६
बिन मांगे जीवन में, अपने पन का जाल बुना| २६
-------
सबके हाथ-पाँव बन, १२ सबके हाथ पाँव बन सबकी- १६
सबकी साधें शीश धरे | १४ या साधें शीश धरे | १०
.जीते जीते सबके – जीते जीते सबके सपने,
सपने हर पल रहे मरे | हर पल रहे मरे |
टेक- थोपा गया माथ पर १२
पर्वत हमने कहाँ चुना
या
थोपा गया माथ पर पर्वत हमने कहाँ चुना | २६


कुछ अन्य उदाहरण देखें ---
१-
------ १४-१२ का पारंपरिक गीत है या नवगीत……
विदा होकर जाते-जाते, १४
बरस बीता कह गया। १२
नवल तुम वो पूर्ण करना, १४
जो नहीं मुझसे हुआ। १२ ----कल्पना रमानी का नवगीत
२-
टुकड़े टुकड़े
टूट जाएँगे १६
मन के मनके
दर्द हरा है १६ = ३२
ताड़ों पर
सीटी देती हैं
गर्म हवाएँ २४
जली दूब-सी
तलवों में चुभती
यात्राएँ २४
पुनर्जन्म ले कर आती हैं
दुर्घटनाएँ २४
धीरे-धीरे ढल जाएगा
वक्त आज तक
कब ठहरा है? ३२ ---- पूर्णिमा वर्मन का नवगीत ..
------
------ सीधा -सीधा 24 / ३२ मात्राओं का पारंपरिक गीत है ... इसे ऐसे लिखिए ....
ताड़ों पर सीटी देती हैं गरम हवाएं , २४
जली दूब सी तलवों में चुभती यात्राएं | २४
पुनर्जन्म लेकर आती हैं दुर्घटनाएं | २४
धीरे धीरे ढल जाएगा वक्त आज तक, कब ठहरा है , ३२
टुकड़े-टुकड़े टूट जायंगे मन के मनके , दर्द हरा है | ३२
\
अतः इस प्रकार नवगीत कोई नवीन विधा नहीं ठहरती अपितु पारंपरिक गीत ही है जिसे गीत का सलाद सा बना कर पेश किया जाता है | हाँ इस बहाने तमाम नवीन कथ्य –तथ्यों के नाम पर दूर की कौड़ी के नाम पर , दूरस्थ व्यंजना के नाम पर ....असंगत कथ्य व तथ्य पेश कर दिए जाते हैं सिर्फ कुछ अलग दिखने हेतु | अब आप देखिये ---
“जग ने जितना दिया
लेलिया
उससे कई गुना
बिन मांगे जीवन में
अपनेपन का
जाल बुना | ---- “
क्या इस कथ्य का कोई अर्थ निकलता है ? अर्थात व्यक्ति को दुनिया कुछ देती नहीं वह ही दुनिया को देता है और जो कुछ वह अपने साथ पैदा होते ही लाता है दुनिया ले लेती है | हमें किसी( दुनिया, दोस्त, माता-पिता, भगवान ) का शुक्रगुज़ार होने की क्या आवश्यकता है |
----
होगयी है कर्मनाशा
समय की गंगा
नहाकर जिसमें हुआ
हर आदमी नंगा |
---- यदि नदी कर्मनाशा है तो बुरा क्या है वह तो कर्मों का नाश हेतु होती ही है ...कर्मनाशा का अर्थ क्या है ....कर्मों का नाश तो मोक्ष है ..उचित ही है ...फिर दोष क्या....समय की नदी तो दुष्कर्म कृत्या हुई है जिससे हर आदमी नंगा हुआ है .... अनर्गल भाव है नदी के स्थान पर गंगा का प्रयोग भी असाह्तियिक व असांस्कृतिक है ....|

------
और भी------
“जली दूब-सी
तलवों में चुभती
यात्राएँ
पुनर्जन्म ले कर आती हैं
दुर्घटनाएँ “ ----- ??
“आतंकों में-
शांति खोजना
केवल पागलपन
लगता है। “
---- यह कौन सा नया महान तथ्य है सब जानते हैं |
शाखाओं का बोझ उठाये
बरगद उठ न सका |
---- फिर वह बरगद ही क्यों कहलाता है फिर अतिरिक्त शाखाएं तो उसका बोझ स्वयं उठाती हैं क्या अर्थ है कथ्य का ?
----
सोने के पिंजरे में
हमने
हर पल दर्द धुना |
…... दर्द के कारण अंग धुना जाता है नकि स्वयं दर्द .कोइ धुनने की चीज़ है ..
मुझे तो इन असंगत कथ्यों का अर्थ समझ आता नहीं है यदि आपको तार्किक अर्थ समझ आ रहा हो तो बताएं |
-------- मेरे विचार में तो इस प्रकार की कविता ही कविता व साहित्य, कवि-साहित्यकारों को जन जन, सामान्य जन से दूर करती जा रही है |
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रविवार, 31 दिसंबर 2017

बणी-ठणी जी--- कवयित्री रसिक बिहारी व किशनगढ़ चित्रकला---डा श्याम गुप्त ...

                                ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

---- बणी-ठणी जी--- कवयित्री रसिक बिहारी व किशनगढ़ चित्रकला ------
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बनी ठनी जी
“बणी-ठणी” राजस्थान के किशनगढ़ की विश्व प्रसिद्ध चित्रशैली है| पर बहुत कम लोग जानते होंगे कि इसका नाम “बणी-ठणी” क्यों और कैसे पड़ा ?
\
राजस्थान के इतिहास में शाही परिवारों की दासियों ने भी अपने कार्यों से प्रसिद्धि पायी है| “बणी-ठणी” भी राजस्थान के किशनगढ़ रियासत के तत्कालीन राजा सावंत सिंह की दासी व प्रेमिका थी| राजा स्वयं बड़े अच्छे कवि व चित्रकार थे| उनके शासन काल में बहुत से कलाकारों को आश्रय दिया गया|
---
-----नागरी दास व रसिक बिहारी -----
------ “बणी-ठणी” रूप सौंदर्य में अदभुत होने के साथ उच्च कोटि की कवयित्री थी| राजा सावंतसिंह तथा दासी दोनों कृष्ण भक्त थे| उनके प्रेम व कला प्रियता के कारण प्रजा ने भी उनके भीतर कृष्ण-राधा की छवि देखी | दोनों को कई अलंकरण प्रदान किये गए | राजा को नागरीदास चितेरे, आदि तो दासी को कलावंती, लवलीज, नागर, उत्सव प्रिया आदि संबोधन मिले| वह स्वयं रसिकबिहारी के नाम से कविता लिखती थी|
-----बनी ठनी --“बणी-ठणी जी ----
------ राजा सावंतसिंह ने इस सौंदर्य और रूप की प्रतिमूर्ति दासी को रानियों की पोशाक व आभूषण पहनाकर एकांत में उसका एक चित्र बनाया| और इस चित्र को नाम दिया “बणी-ठणी” | राजस्थानी भाषा के शब्द “बणी-ठणी” का मतलब होता है "सजी-संवरी","सजी-धजी" | राजा ने अपना बनाया यह चित्र राज्य के राज चित्रकार को दिखाया और उसे अपने दरबार में प्रदर्शित कर सार्वजानिक किया|
----- इस चित्र की सर्वत्र बहुत प्रसंशा हुई और उसके बाद दासी का नाम “बणी-ठणी” पड़ गया| सब उसे “बणी-ठणी” के नाम से ही संबोधित करने लगे|
------ राज्य के चित्रकारों को भी अपनी चित्रकला के हर विषय में राजा की प्रिय दासी “बणी-ठणी” ही आदर्श मोडल नजर आने लगी और “बणी-ठणी” के ढेरों चित्र बनाये गए जो बहुत प्रसिद्ध हुए और इस तरह किशनगढ़ की चित्रशैली को “बणी-ठणी” के नाम से ही जाना जाने लगा|
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राजा नागरीदास व बनी ठनी चित्रकला
------किशनगढ़ के चित्रकारों के लिए यह प्रेम वरदान सिद्ध हुआ है क्योंकि यह विश्व प्रसिद्ध चित्रशैली भी उसी प्रेम की उपज है और इस चित्रशैली की देश-विदेश में अच्छी मांग है|
\
“बणी-ठणी” सिर्फ रूप और सौंदर्य की प्रतिमा ही नहीं थी वह एक अच्छी गायिका व उत्तम कोटि की कवयित्री और भक्त-हृदया नारी थी | बनीठनी की कविता भी अति मधुर, हृदय स्पर्शी और कृष्ण-भक्ति अनुराग के सरोवर है|
-----वह अपना काव्य नाम “रसिक बिहारी” रखती थी| रसिक बिहारी का ब्रज, पंजाबी और राजस्थानी भाषाओँ पर सामान अधिकार था|
-----रसीली आँखों के वर्णन का एक पद उदाहरणार्थ प्रस्तुत है-
रतनारी हो थारी आँखड़ियाँ |
प्रेम छकी रस बस अलसारणी, जाणी कमाल पांखड़ियाँ |
सुन्दर रूप लुभाई गति मति हो गई ज्यूँ मधु मांखड़ियाँ|
रसिक बिहारी वारी प्यारी कौन बसि निसि कांखड़ियाँ||

---------उनके द्वारा कृष्ण राधा लीला वैविध्य की मार्मिक अभिव्यक्ति पदों में प्रस्फुटित हुई है| एक सांझी का पद इस प्रकार पाठ्य है-
खेले सांझी साँझ प्यारी|
गोप कुंवरि साथणी लियां सांचे चाव सों चतुर सिंगारी||
फूल भरी फिरें फूल लेण ज्यौ भूल री फुलवारी|
रहया ठग्या लखि रूप लालची प्रियतम रसिक बिहारी||

---------प्रिय की अनुपस्थिति प्रिया के लिए कैसी कितनी पीड़ाप्रद और बैचेनी उत्पन्न करने वाली होती है, यह तथ्य एक पंजाबी भाषा के पद में प्रकट है-
बहि सौंहना मोहन यार फूल है गुलाब दा|
रंग रंगीला अरु चटकीला गुल होय न कोई जबाब दा|
उस बिन भंवरे ज्यों भव दाहें यह दिल मुज बेताब|
कोई मिलावै रसिक बिहारी नू है यह काम सबाब दा || 



चित्र-१-कविवर नागरी दास ( राजा सावंत सिंह ) एवं बनी ठनी चित्रकला
चित्र २ -बणी-ठणी जी रसिक बिहारी ...
चित्र ३ व अन्य चित्रकला राधा कृष्ण व बनी ठनी जी



मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

दोहे--श्याम के---- डा श्याम गुप्त ....

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


दोहे--श्याम के----
=====
धर्म हेतु करते रहें ,काव्य साधना कर्म,
जग को दिखलाते रहें, शुभ कर्मों का मर्म |

श्याम जो सुत हो एक ही,पर हो साधु स्वभाव,
कुल आनंदित रहे ज्यों, चाँद-चांदनी भाव |

नारी सम्मति हो जहां, आँगन पावन होय,
कार्य सकल निष्फल वहां, जहां न आदर सोय|

हितकारी भोजन करें,खाएं जो ऋतु योग्य,
कम खाएं पैदल चलें, रहें स्वस्थ आरोग्य |

अपने लिए कमाय औ, केवल खुद ही खाय,
श्याम पापमय अन्न है, जो न साधु को जाय |

काव्य स्वयं का हो लिखा, माला निज गुंथ पाय,
चन्दन जो निज कर घिसा, अति ही शोभा पाय|

आयु कर्म धन विद्वता, कुल शोभा अनुसार,
 उचित वेश धारण करें, वाणी बुद्धि विचार |     

 

मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

गुरुवासरीय गोष्ठी दिनांक ०७ दिसंबर २०१७ गुरूवार---डा श्याम गुप्त

                                     ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



            गुरुवासरीय गोष्ठी दिनांक ०७ दिसंबर २०१७ गुरूवार
       प्रत्येक माह के प्रथम गुरूवार को होने वाली विशिष्ट गुरुवासरीय गोष्ठी दिनांक ०७ दिसंबर २०१७ गुरूवार को डा श्यामगुप्त के आवास सुश्यानिदी , के-३४८, आशियाना, लखनऊ पर संपन्न हुई | गोष्ठी में साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य, नवसृजन संस्था के अध्यक्ष डा योगेश गुप्त, कविवर श्री बिनोद कुमार सिन्हा,अनिल किशोर शुक्ल निडर, श्री रामदेवलाल विभोर,  प्रदीप कुशवाहा, महेश अस्थाना, प्रदीप गुप्ता, श्रीमती पुष्पा गुप्ता, विजयलक्ष्मी महक , मंजू सिंह एवं श्रीमती सुषमागुप्ता व डा श्यामगुप्त ने भाग लिया |
       वाणी वंदना डा श्याम गुप्त, सुषमागुप्ता व श्रीमती विजय लक्ष्मी महक ने की | गोष्ठी का प्रारंभ करते हुए श्री अनिल किशोर शुक्ल निडर ने तम्बाकू की हानियों पर प्रकाश डालते हुए दोहे प्रस्तुत किये---
तम्बाकू से फेफड़े होने लगते ग्रस्त |

उल्टी होती जब कभी गिरने लगता रक्त |
       डा.योगेशगुप्त ने नदी रेत व सागर के अंतर्संबंध की दार्शनिक व्याख्या करते हुए अतुकांत रचना प्रस्तुत की ---बाँध बांधने से भी क्या होगा

          नदी को तो खोना ही है ;

          रेत के विस्तार में

          या सागर के प्यार में |
       श्रीमती पुष्प गुप्ता ने गृहस्थ जीवन को अग्निपथ बताते  हुए कहा—
गृहस्थ जीवन अग्निपथ, गृहणी की कर्मभूमि,

तपोभूमि, निष्ठा परिपक्व, सहज मन, अच्युत थिर हो | 
      श्रीमती मंजू सिंह ने फूलों की विशिष्टता पर गीत सुनाते हुए कहा-
फूल कभी रोते नहीं ,

फूलों को तो बस हंसना आता है |
       श्रीमती विजय लक्ष्मी महक ने बेटी व दुल्हन समन्वित गीत प्रस्तुत किया—
बेटी वाला क्या देगा, क्या लोगो तुम,

बेटी से बढकर कोइ सौगात नहीं होती
      कविवर  श्री महेश अस्थाना प्रकाश ने दिल से दिल को राहत पर गुनगुनाया---
आओ हम गुनगुनालें, दिल से दिल मिला हम लें |

ना शिकवा हो ना शिकायत, दिल से दिल को राहत मिले |
    कवि प्रदीप गुप्ता ने भी फूलों की नाजुकता यूं बयाँ की---
फूल आहिस्ता फैंको, फूल बड़े नाज़ुक होते हैं,

होजाते हैं खुद तो घायल, पर औरों को सुख देते हैं|
    प्रदीप कुशवाहा ने जीवन के बारे में अपना अभिमत प्रस्तुत करते हुए कहा –

जीवन स्वयं एक प्रश्न है,सबको हल करना है |

हंसकर या रोकर, प्रदीप जीवन जीना है |
      
      बिनोद कुमार सिन्हा ने पुराने ज़माने को याद करते हुए गुनगुनाया—
वे भी क्या ज़माने थे  हर क्षण खुश के तराने थे |

मेरी हसरत भरी निगाहें, बेसब्र रही थी दीदार के |
    श्री रामदेव लाल विभोर ने अँधेरे और जुगनूं की बात की –
चमकना गर न आता हो, तो पूछो उस अँधेरे से,

उड़ा करता जहां जुगनूं, है खुद की रोशनी लेकर |
     सुषमागुप्ता जी ने मुरलीधर कान्हा को करुणा का सागर बताते हुए गीत प्रस्तुत किया—
हे करुणा के सागर श्याम,

मुरलीधर कान्हा घनश्याम |
       डा श्यामगुप्त ने आजकल चिकित्सकों व अस्पतालों में हो रही लापरवाही पर जन सामान्य को भी दोषी बताते हुए एक नवीन तथ्य की प्रस्तुति की ---
पैसा आज बहुत पब्लिक पर, सभी चाहते, ‘वहीं’ दिखाएँ |

चाहे जुकाम या कुछ खांसी, विशेषज्ञ ही हमको देखे |.......
    तथा उन्होंने नारी की त्रासदी को इंगित करते हुए एक प्रश्न उठाया---–
औरत आज भी डर डर कर जिया करती है ,

जाने किस बात की कीमत अदा करती है |
        अगीत विधा के प्रवर्तक एवं अखिल भारतीय अगीत परिषद् के संस्थापक अध्यक्ष साहित्यभूषण साहित्यमूर्ति डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने गोष्ठी की समीक्षात्मक सराहना करते हुए अपना सुप्रसिद्ध गीत सुनाया....
जगमगाता हुआ दीप मैं बन सकूं

स्नेह इतना ह्रदय में भरो आज तुम |
      द्वितीय सत्र में कविगण पुष्पा गुप्ता, विजय लक्ष्मी महक, मंजू सिंह, प्रदीप कुशवाहा, महेश अष्ठाना, श्री रामदेव लाल विभोर एवं सुषमा गुप्ता को सम्मान पात्र देकर को सम्मानित भी किया गया |
      संक्षिप्त जलपान एवं डा श्याम गुप्त द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के पश्चात् गोष्ठी समाप्त हुई |

गोष्ठी का दृश्य

साहित्यकारों का सम्मान